2025-03-04
IDOPRESS
नई दिल्ली:
ये साल 2007 था,जब बीएसपी नेता मायावती बिल्कुल अपने दम पर देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. हालांकि इसके पहले वो तीन बार और मुख्यमंत्री बन चुकी थीं,लेकिन ये पहली बार था जब उन्होंने बसपा के बहुमत के सहारे सरकार बनाई. ये भारतीय राजनीति में दलित उभार की सबसे बड़ी लकीर थी. हालांकि ये उभार रातों-रात नहीं हुआ था. इसके पीछे जिस शख्स की मेहनत थी,उसका नाम कांशीराम था. कांशीराम भारतीय समाज और राजनीति की जटिलताओं को समझते थे. दलित राजनीति को नई आक्रामकता और पहचान देने को तैयार थे. शुरुआत उन्होंने 1971 से की,जब उन्होंने बामसेफ़ बनाया- यानी पिछड़े और अल्पसंख्यक सरकारी कर्मचारियों का संगठन. फिर 1984 में डीएस-4 का गठन किया. यानी एक डी और चार एस- दलित शोषित समाज संघर्ष समिति. सरकारी नौकरी छोड़ कर साइकिल पर घूम-घूम कर बहुजन समाज पार्टी को संगठनात्मक मज़बूती और गहराई दी.शुरुआत उन्होंने पंजाब और मध्य प्रदेश से की,लेकिन जल्द ही यूपी उनकी राजनीतिक प्रयोगशाला बन गया.
अपने चुस्त और सटीक जुमलों के साथ कांशीराम ने दलित राजनीतिक के मुहावरे गढ़े. कांग्रेस और बीजेपी को सांपनाथ और नागनाथ बनाते हुए भी बीएसपी को इनसे समझौते के लिए तैयार किया. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद लेकिन सबसे ऐतिहासिक समझौता मुलायम सिंह यादव के साथ किया और 1993 के चुनावों में दलित-पिछड़ा भागीदारी के साथ सरकार बनाने में मदद की. ये गठजोड़ टिका नहीं,लेकिन मायावती आगे निकल चुकी थीं. वे चार बार मुख्यमंत्री बनीं. 2007 में तीस फ़ीसदी से ज़्यादा वोट और 206 सीटें लेकर उन्होंने सरकार बनाई. लेकिन 2007 से 2025 तक आते-आते तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है. जो संगठन की पार्टी थी,वो व्यक्ति तक चली आई है और उसमें परिवार का झगड़ा चला आया है.जिस दल ने यूपी में 4 बार शासन किया,वो अंतर्कलह के दलदल में फंसा दिखाई दे रहा है.
जहां तक अशोक सिद्धार्थ जी का सवाल है वो महान व्यक्ति हैं. मैं बहुत नजदीक से जानता हूं अशोक सिद्धार्थ जी को. अब वह कैसे क्या अंदर चल रहा है,मैं अंदर की बात ना जानता हूं ना जानना चाहता हूं यह बहुजन समाज पार्टी जो टूट रही है बिखर रही है उसकी मुझे तकलीफ है.
बीएसपी के मचे इस उठापटक पर जहां बीजेपी ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा वहीं सपा और कांग्रेस ने मायावती पर सीधा हमला बोल दिया है. विपक्षी दल बीएसपी पर परिवार में कलह की बात पर हमला बोल रहे हैं. विपक्ष के इस हमले पर बीएसपी के प्रदेश अध्यक्ष इन दावों को ख़ारिज करते हैं. साल 2012 में यूपी की सत्ता से हटने के बाद बीएसपी का कैसे पतन हुआ,ये इन आंकड़ों से बेहतर समझा जा सकता है.
2007 में 206 सीटें पाकर बीएसपी यूपी की सत्ता में आई2012 में सत्ता गई लेकिन बीएसपी 80 सीटों के साथ दूसरे नंबर पर रही2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खाता नहीं खुला2017 में विधायकों की संख्या मात्र 19 रह गई2019 में सपा से गठबंधन किया तो दस सांसद चुनाव जीते2022 में बीएसपी को विधानसभा में मात्र एक सीट मिली2024 में अकेले चुनाव लड़ने वाली बीएसपी फिर से खाता नहीं खोल पाई10 दिसंबर 2023 में आकाश आनंद को उत्तराधिकारी बनाया गयाफिर 7 मई 2024 को उन्हें पद से हटा दिया गयाइसके बाद फिर 23 जून 2024 को फिर से आकाश को मायावती ने आशीर्वाद दियाअब 2 मार्च 2025 को वापस आकाश को मायावती ने ज़मीन पर ला दिया
2007 में बसपा 30.43 फीसदी पाकर 206 सीटें जीती2012 में 25.95 प्रतिशत के साथ 80 सीटेंसाल 2017 में 22.23 प्रतिशत के साथ 19 सीटें साल 2022 में मात्र 12.08 फीसदी मत और एक सीट मिली
इस गिरते ग्राफ के बीच जब आकाश आनंद पर कार्रवाई हुई तो उन्होंने सधे हुए अंदाज़ में कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया दी है,जैसी उन्होंने पिछले साल मई महीने में दी थी. इस बीच विपक्ष और राजनीति को समझने वालों ने बीएसपी की आतंरिक कलह को लेकर जमकर हमला किया है. विपक्ष के मुताबिक़ बीएसपी के आंतरिक कलह की वजह कुछ ये है. फ़िलहाल मायावती ने आकाश को ज़मीन पर लाकर 2027 की तैयारी शुरू कर दी है. अब सवाल ये है कि क्या मायावती का ये कार्ड काम करेगा,सवाल ये भी कि अब आकाश आनंद का राजनैतिक भविष्य क्या होगा? सवाल ये भी कि बीएसपी अपने कैडर वोट बैंक को वापस अपने साथ लौटेगी या नहीं? इन सभी सवालों का जवाब अभी भले ना मिले लेकिन उम्मीद है 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजों से ना सिर्फ इन सवाल का जवाब मिलेगा बल्कि बीएसपी का भविष्य का आंकलन भी संभव हो सकेगा.